दुखों का विरेचन (Catharsis) - 02
सामान्य तौर पर, हमें जिससे दुख मिल रहा होता है - हमारी पूरी कोशिश होती है; उसे बदलने की। यदि उसमें बदलाव आ जाएं तो कुछ पल के लिए प्रसन्नता आती हुई प्रतीत होती है। हमारा ध्यान इस पर नहीं जाता है कि हम स्वयं में बदलाव लायें और उन दुखो की समाप्ति से मिलने वाले खुशी की विषयवस्तु हम स्वयं को बनाएं।
तो वह किसान उस दिन ईश्वर से तथा उसकी व्यवस्थाओं से बहुत नाराज़ हुआ और लगा ईश्वर को कोसनें कि हे भगवान! तुझे दुनिया चलाने नहीं आती है, तु असमय ही वर्षा कर देता है, बाढ़ और तूफान ला देता है; मेरा पूरा फसल बर्बाद हो गया है। और किसान ने कहा कि मैं चाहता हूं तुम संसार ना चलाओ, मुझे चलाने दो। ईश्वर ने बहुत समझाया कि देख, ऐसा मत कर मेरा काम मुझे करने दे। लेकिन वह किसान नहीं माना और ईश्वर ने संसार चलाने की चाभी उसको सौंप दी। उसने जब जरूरत और जितनी मात्रा में जरूरत थी- फसलों के लिए वर्षा की, उष्णता प्रदान की, ठंडी और गर्म हवाओं का समन्वय रखा तथा अन्य सभी परिस्थितियां फसलों को इस तरह मुहैया कराया जो उनके लिए सर्वाधिक सुखात्मक रूप से उपयुक्त था। फसल तैयार हुई और उसकी कटाई की गई लेकिन गेहूं की बालियों में गेहूं सब अपरिपक्व और बेकार, धान में सब पोपट- सब फसल चौपट हो गया। उसने ईश्वर से गुहार लगाई कि यह क्या हुआ? मैंने तो सबकुछ उपयुक्त मात्रा में दीं लेकिन फसल फिर भी चौपट हो गया और ईश्वर ने जवाब दिया कि- तूने इन फसलों को दुख और कठिनाई के वे पल दिये ही नहीं जब वे परिपक्व होते और अधिक मजबूत बनते, सुख ने इन्हें निकम्मा बना दिया। मैंने जब असमय वर्षा की, बाढ़ और तूफान लाई तो इनकी मजबूती के लिए था। दुख हमें मांजता है, कठिन परिस्थितियां धैर्य धारण करना सिखाती है।
जीवन दुख है और दुख के क्षणों में यही जीवन गले में फांस की तरह बंध जाता है। जब एक एक पल, व्यतीत करना अंगारों पर चलने के सदृश प्रतीत होता है। लेकिन उन क्षणों से निकलकर, तटस्थ या सूखों के पलों में - हम उन्हीं पलों की चर्चा कर रहे होते हैं कि एक बार ऐसा हुआ कि..., एक बार वैसा हुआ कि...। परंतु अब इन चर्चाओं में हमें उन दुखो से मिली पीड़ा दुबारा नहीं परेशान करती है। वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और ह्रदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है। फिर मध्याह्न का प्रखर ताप आता है, क्षण क्षण पर बगुले उठते हैं और पृथ्वी कांपने लगती है। लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और वास्तविकता अपने नग्न रुप में सामने आ खड़ी होती है। उसके बाद विश्राममय संध्या आती है, शीतल और शांत, जब हम थके हुए पथिकों की भांति दिनभर की यात्रा का वृतांत कहते हैं और सुनते हैं तटस्थ भाव से, मानो हम किसी ऊंचे शिखर पर जा बैठे हैं, जहां नीचे का जन-रव हम तक नहीं पहुंचता। सम्पूर्ण जीवन एक प्रतियोगिता नजर आती है जहां यह स्पर्धा चल पड़ी है कि कौन सबसे पीड़ादायक दुःखों को सहकर और झेलकर दिखाता है और जीवन के निर्वणोन्मुख और महंगी मोती चुन लेता है।
सूफी भक्त मंसूर को इतिहास में सबसे दर्दनाक मौत दी गई। जब उसके दोनों पैरों को काट दिया गया तो वह जोर से चिल्लाया कि हे ईश्वर! धन्यवाद तेरी जय हो और जब दोनों हाथों को काट दिया गया, आंखें फोड़ दी गई तो वह एक बार फिर चिल्लाया, ईश्वर को धन्यवाद दिया और बोला- मंसूर जीत गया तथा जोर से हंसा। आस पास खड़े लोगों को अचरज हुआ और उन्होंने पूछा, तुझे क्या हुआ? तू पागल तो नहीं हो गया है- इतने भयानक पीड़ा में भी तू हंसता है। मंसूर ने जवाब दिया कि मुझे शक था कि क्या इतनी पीड़ा में भी मैं ईश्वर से प्रेम करना जारी रखा पाऊंगा ? लेकिन 'आज मैं जीत गया- ईश्वर के लिए मेरा प्रेम घटा नहीं बल्कि और बढ़ रहा है।' सुकरात को जब जहर का प्याला दिया जा रहा था; तब वह खुश था और उसके चेहरे पर मौत का तनिक भी डर नहीं था। उसके शिष्य अधिक दुखी थी। उनमें से एक क्रेटो ने पूछा कि आपको क्या हो गया, हम इतने दुखी हैं और आप इतने खुश हैं जबकि मौत सामने है। सुकरात ने जवाब दिया- मैं मौत से मिलने को बेताब हूं; यह मेरे लिए बिल्कुल नया अनुभव होगा और यदि मैं मरा और बिल्कुल ही मर गया तो दुखी होने को मैं ना रहूंगा और यदि जीवित रहा तो भी सुखी होने को मैं ना रहूंगा। संसार में ऐसे ऐसे लोग हुए जो अत्यंत दुख में भी मस्त रहें और मौज मस्ती में रहें लेकिन हम तनिक दुख से टूट जाते हैं; इन पलों में अच्छा देखने की इच्छाएं हमारे भीतर होनी चाहिए।
मनुष्य कमजोर है और नाना प्रकार के दुख उसे उसकी कमजोरी का अहसास कराते हैं। व्यक्ति छूटने के डर, खोने के डर से भर जाता है तथा उन महान दुःखों से दूर भागता है जिनका घटना अनिवार्य है। जैसे, अपने सगे संबंधियों की मौत और इसके ना होने की दुआएं - वह परमात्मा से मांगता है। क्योंकि वे दुख अत्यंत पीड़ादायक होते हैं। ऐसे में, मनुष्य परमात्मा की खोज करता है, प्रार्थनाएं और अराधना करता है। परंतु परमात्मा के पास जाकर, परम शांति की अनुभूति भी होती है। बाइबल कहता है कि जीवन में जब दुख आयें तो परमात्मा को धन्यवाद दो। और दुख के पलों में उन्हें सहते हुए- सुख की तरफ देखने का प्रयास करो। लगाव में पीड़ा है, किसी भी मनुष्य के साथ होने में दुख अकस्मात ही सामने उभरकर आ जायेंगें और किसी के साथ ना होने में जीवन जीना कठिन हो जाता है, अकेलापन हमें अत्यंत मानसिक दुख देता है। हिंदी साहित्य के छायावाद कालखंड में चारों रचनाकारों को दुःखों ने मांजा है। निराला ने अपनी बेटी को खोया और उसकी याद में 'सरोज स्मृति' लिखा। और महादेवी ने तो लिखा है -"मैं नीर भरी दुख बदली ।"
दुखों का विरेचन अधिक सारगर्भित और सधे हुए ज्ञान से करना न्यायोचित होगा। B039.
अरविंद कुमार।
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