मुझको डुबोया मेरे होने ने।
वृक्ष की उन टहनियों पर लटककर, फेफड़ों में उच्छवास घना करते हुए - मैं तालाब की गहराई और चौड़ाई की कल्पना कर सिहर जाता हूं। इस भय को समाप्त करने हेतु, मैं तीव्रता से तालाब में कूद पड़ता हूं और तैरने लगता हूं और बीच जल की गहराई में, मैं डूबने का प्रयास करता हूं लेकिन तैरने की आदत इतनी परिपक्व हो गई है कि स्वयं को तालाब के दूसरे छोर पर पाता हूं। 6 दिन पहले ही तो, मैंने उन्हें हंसते और भांति भांति प्रकार के व्यंजन तैयार करते हुए देखा और 6 दिन बाद, मैं उनके शरीर को चिता पर जलते हुए देख रहा था। शरीर के जलने की गंध, मेरी आंखों से गुजरकर - जीवन का अंतिम सत्य देखने को मजबूर कर रही थीं। मेरे होने और मेरे ना होने में - कुछ दिनों की भावनात्मक तीव्रता ही है जो मस्तिष्क को जकड़ लेगी और तदुपरांत जीवन उससे अधिक विस्तृत रूप में निखरेगा।
कभी कभी, मैं कल्पनाओं की अनन्त सागर में डूबता हूं और विचार मुझे बहाकर कीचड़ से भरे दलदल में छोड़ देते हैं अर्थात मुझे कोई परिणाम दिखता नजर नहीं आता है। जीवन एक है- जीने के लिए भी और प्रयोग करने के लिए भी। मैं हजारों प्रयोग कर सकता हूं परन्तु एक भय मस्तिष्क को जकड़ लेती है। यह विचार करके कि समस्या प्रत्येक जगह है; हो सकता हो समस्या का प्रतिरूप या प्रकार बदल जाए- मैं एक ही विकल्प पर रहने का प्रयास करता हूं और उससे उठने वाले दर्पो को छाती से लगाता हूं। उन घर्षणों पर मैं इसलिए भी चलता हूं क्योंकि ना चलने से उठने वाले दुख के भय से - मैं नज़रें चुराता हूं।
जीवन खण्डों में बंटा हुआ नजर आता है; जहां कोई भी संकल्प, कोई भी निर्णय दूर तक लेकर नहीं चल मिलता है। मन की वासनाएं हमेशा मुझे परास्त कर देती हैं। एक हारे हुए यौद्धा की भांति जलते हुए मकान को, मैं निहारता हूं। मन के तीनों स्तरों के बीच समन्वय नहीं है। पार्क की वह मुरझाई हुई घास, मुझे कब्रिस्तान की याद दिलाती है; जहां से प्रत्येक व्यक्ति गुजरता है, अपने यथार्थ और जीवन की अंतिम परिणति से साक्षात्कार करता है परंतु उसका अहंकार उसमें यूकेलिप्टस की वृक्ष की तरह तना खड़ा रहता है और कब्रिस्तान में पड़ी अस्थि पंजर मनुष्य की बेवफाई और मुर्खता पर ठहाके मारकर हंसता रहता है। मैं सिर्फ चुभन, टीस और प्रतारणा को पसीने और गर्द से लथपथ हो रहा हूं - आखिकार उसके जुल्फों की खुशबू नासापुटों से होकर पूरे शरीर में अनन्त प्रसन्नताओं को क्यों जन्म दे रही थीं और मैंने उसकी कमजोरी को अपनी नियति मानकर क्यों नहीं हमेशा मुलायम व्यवहार किया।
मैं थककर टूक टूक हो रहा हूं। पलभर कहीं बैठना चाहता हूं और कुछ पल सबकुछ बाहर का ही देखना चाहता हूं।
अरविंद कुमार।
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