मेरा दुश्मन
तनिक देखो उसको, कैसे धूर्त जैसा खड़ा है, जैसे इसने ठान लिया है कि मुझे बर्बाद करके छोड़ेगा। ज़िन्दगी को इसने एक मजाक बनाकर रख दिया है, मैं जब उससे गम्भीरता की बात करता हूं और जीवन में घटने वाली प्रत्येक घटना को गम्भीरता से लेने की वकालत करता हूं तो वह मेरी गम्भीरता को एक पाषाण से करता है और कहता है, तुम मनुष्य हो; जीवन के हर पल को प्रसन्नता से जीओ, उत्साह और जोश भरों। ज़िन्दगी में गम्भीर होना जैसा कुछ भी नहीं है, तुम गम्भीर हुए और जीवन हाथ से फिसला। इसपर भी, मैं उसके तर्कों से सहमत नहीं हूं। मैं जब कभी भी एक या दो पल प्रसन्नता के बिताता हूं, तो वह संसार की चिंताएं, अवसाद लाकर मेरे ऊपर पटक देता हैं। कल मैंने उससे कहा,' तू मेरा गुलाम है और मैं तेरा स्वामी हूं, तुझे मेरी हर बात माननी होगी।' उसने मुझपर व्यंगपूर्ण रवैये से हंस दिया और मेरा मजाक भी मनाया और मुझे चुनौती दे डाला कि मुझसे कुछ करा के दिखाओ। मैंने भी उसकी यह चुनौती स्वीकार कर ली और 30 घंटों तक लगातार जगाए रखा और नींद की एक झपकी भी नहीं लेने दीं, तब जाके इसकी कमर में कुछ लचक आई। परंतु दूसरे ही पल वह फिर लहलहाकर खड़ा हो गया।
मैं जैसे कमजोर पड़ता हूं, वह मुझे परास्त कर देता है और बेशर्मों की तरह एक कोने में खड़ा होकर मेरी खिल्ली उड़ाता है, हमेशा मेरा ध्यानाकर्षण एक क्षणिक सुख की तरफ ले जाता है, जहां मैं बिल्कुल नहीं जाना चाहता और यह सुख केवल शारीरिक होता है। वह तो मुझसे पूछना भी उचित नहीं समझता है कि किस प्रकार का सुख की आकांक्षा मैं रखता हूं। किंतु वह मुझ पर हावी है जैसे नदियां सागर पर हावी है और कितनी रूकावटों के बाद भी वो अपना रास्ता सागर तक जाने में बना लेती हैं। मैं बार बार उसकी चिकनी चुपड़ी बातों में आ जाता हूं, मैं स्वयं को अधिक समय तक नियंत्रित नहीं रख पाता हूं। एक या दो बार ऐसा होता है कि मैं उसपर विजय प्राप्त कर लेता हूं तो वह इतना ज्यादा शक्तिशाली और क्रोधित हो जाता है कि अगली बार और अधिक क्रूरता से मेरे ऊपर प्रहार करता है और मेरी आत्मसंयम और आत्मसम्मान की धज्जियां उड़ा देता है। मैं उससे कहता हूं कि तू मुझे एक बहुत अच्छा इंसान क्यों नहीं बनाता हैं, वह दुष्ट ने मेरी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि, जब तू मुझे एक अच्छी दिशा में नहीं ले जा सकता है तो जब मैं ऐसा प्रयास करता हूं तो उसमें तू एक कांटे की भांति क्यों खड़ा हो जाता हैं? क्यों इसमें एक बांधक बनता है !
कहने लगा, तू मुझे पहले परास्त कर, मुझे हरा, अभी तक तू मेरा गुलाम है, तू मुझे अपना गुलाम बना और फिर तू मेरे ही सहारे उच्च स्तर पर पहुंच पाएगा और इतना कहकर उस धूर्त ने ऐसी राक्षसों वाली मुस्कान भरी कि मेरे पूरे शरीर में एक असहनीय पीड़ा पैदा हो गई। कल मेरी और उसकी, कोर्ट में पेशी थी, हम दोनों ने एक दूसरे पर केस दर्ज किया था। मैंने अपनी व्यथा जज को सुनाई कि मैं इससे संघर्ष कर रहा हूं, मैं इससे छुटकारा पाना चाहता हूं, मुझे इसके साथ नहीं रहना है। मैंने अपना पूरा वृतांत और दुख जज को सुनाई लेकिन आश्चर्य तब हुआ जब जज ने बिना उसे सुने फैसला मेरे खिलाफ सुना दिया और मुझे दोषी ठहरा दिया । मैं बहुत घबरा गया और आंखों में आंसू आ गये तो मैंने पूछा, योर आनर! यह कैसा आपका न्याय हैं? आपने मुझे दोषी ठहरा दिया, मेरा अपराध क्या हैं? जज ने बताया कि तेरा अपराध यही है कि तूने अभी तक उस पर विजय प्राप्त नहीं किया, उसे पहले तू परास्त कर। बहरहाल, मुझे नहीं पता, मैं उसे कैसे हराऊंगा, हरा पाऊंगा या नहीं, बड़ी दुविधा हैं। परंतु मैं उससे संघर्ष कर रहा हूं!
अरविंद कुमार...!
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