वे मासूम आंखें

एक नौ वर्ष का लड़का सब्जी के ठेले पर आया। वह बहुत ही गोरा था लेकिन गरीबी ने उसके चेहरे पर मैल बिठा रखा था। वह सब्जी के ठेले पर आकर कुछ देर के लिए खड़ा हो गया और कुछ कह नहीं रहा था। सब्जी वाले ने पूछा, क्या चाहिए? वह अपनी आंखों को छिपाकर, और बड़ी करूणा से बोला। एक पाव भिंडी चाहिए, इतना कहकर वह इधर उधर देखने लगा। अच्छा, गरीब परिवारों में जब भी कोई सदस्यों अपने बच्चे को कुछ सब्जी या दूसरे वस्तु खरीदने के लिए बाजार भेजते हैं तो उसका मूल्य उन्हें पहले से पता होता है इसलिए उन वस्तुओं का उतना ही मूल्य पहले से देकर बाजार भेजते हैं और यदि मूल्यों में तनिक भी वृद्धि होती है तो उन पर महंगाई का पहाड़ टूट पड़ता है। उस बच्चे को पहले से ही यह पता था कि भिंडी 10 रूपये पाव हैं। जब दुकानदार ने उससे कहा कि लाओ 10 रूपये दो। तो वह मूल्य जानते हुए भी भौंचक्का रह गया। उसने कहा मेरे पास केवल 8 रूपये हैं, दो रूपये मैं कल लाकर दे दूंगा। सब्जीवाले ने सब्जी देने से मना कर दिया और उसने पूछा जाओ दो रूपया और लेकर आओ। वह लड़का रूआंसा सा हो गया, उसके शरीर में कम्पन आ गयी। उसने मैं तो पूरा 10 रूपया लेकर आया था लेकिन 2 रूपया कहीं गिर गया, सब्जीवाले ने कहा, गिर गया या फिर तुम खा लिए। वह कुछ ना बोल पाया, लेकिन उसकी आंखे सब बता रही थी। सब्ज़ीवाले ने कहा 8 रूपये का भिंडी दे देता हूं। लड़के ने कहा, अम्मा बहुत मारेगी, सब्जी कम हुई तो सब लोगों के खाने को कम पड़ जाएगा और अगर मैंने अम्मा को बताया कि 2 रूपया गिर गया तो अम्मा और मारेगी। मारेगी इसका दुख नहीं है,‌ वह मुझ पर विश्वास करना छोड़ देगी। सब्ज़ीवाले उसकी बातें बहुत ही अटपटे मन से सुन रहा था। मैं वहीं पास में खड़ा था और उसकी बातें, उसका चेहरा देख और सुनकर मेरे सीने में करूणा का भयानक ज्वर पैदा हो रहा था। अंत में सब्जीवाले ने 8 रूपये की ही‌ सब्जी दी और वह किसी तरह खुद को खींचता हुआ घर की तरफ ले गया। नहीं, मैंने कोई मदद नहीं की, ऐसा नहीं कि मैं करना नहीं चाहता था क्योंकि जीवन के बेहतरीन सबक इन्हीं से सीखा जा सकता है। गरीबी केवल फिल्मों में रोमांटिक लगती है, असल जीवन में यह रोज मौत का अहसास कराती है।

May 13, 2023.

Comments

Popular posts from this blog

आत्म जागरूकता का तार्किक पक्ष।

आत्मा से सत्य की ओर ।

बड़े होने का अर्थ।