हम और हमारी भावनाएं - 1 ( भाग एक )
वे आंखें जब उसकी तरफ उठती और उन दोनों की आंखें चार होती तो दोनों के ह्रदयों में जैसे एक साथ सैकड़ों प्रकार की इच्छाएं और वासनाएं एक पल में जन्म लेती और दूसरे ही पल में तीव्र हवाओं के झोंके से एक पल में बुझ जाती। दोनों एक दूसरे के नजदीक जाकर एक दूसरे में समा जाना चाहते थें लेकिन प्रेम में यह घटना बहुत देर बाद घटती है, उसके पहले दोनों ( लड़का और लड़की) को प्रेम का इजहार करना होता हैं । इस प्रेम को अगर हम परिभाषित करें तो यह जान पायेंगे कि वासनाएं और इच्छाएं अधिक मात्रा में हावी है, नहीं तो पहली नजर में कोई किसी को अपना कैसे बना सकता है। यदि ठहरकर इसपर विचार किया जाय तो इसमें गहराई नजर नहीं आती है। जापान में अकेलापन अधिक मात्रा में हावी है जिसके कारण लोग वहां प्रेमी या प्रेमिका, मां या बहन किराए पर कुछ घंटों के लिए ले सकते हैं। वहां उन लड़कियों पर रिसर्च किया गया जो किराए पर गर्लफ्रेंड पर बनती है और उनमें से 80% लड़कियों का कहना था कि बहुत से लड़के हमसे मिलते ही प्यार में पड़ गये और जब हमने उनसे शादी की बात की तो वे भाग खड़े हुए। प्रेमी-प्रेमिका में जो यह प्रेम नामक भावना होती है वे उन्हें एक दूसरे के लिए बेहद जरूरी और कीमती बना देती हैं और इसी के सहारे वे पूरा जीवन एक अटूट डोर में बंधकर बिता देते हैं।
मनुष्य नदी में तैरता उस चींटी के समान है जो केवल एक तिनके का सहारा खोजता है कि वह तिनका मिल जाए तो उसके सहारे वह नदी के उस पार चला जाए। और वह तिनका ही हमारी भावनाएं है। भावनाएं संसार के सभी मनुष्यों में पाई जाती है और यही इंसान को एक डोर में बांधे रहती है, यही से इंसानियत का जन्म होता हैं। यदि कोई मनुष्य भावनाओं का प्रबंधन करना या इन पर नियंत्रण पा लेता है ( जो कि बहुत कठिन है और कभी कभी असम्भव) तो वह मनुष्यजाति पर शासन कर सकता है। भावनाएं एक तरफ जहां मनुष्य के जीवन को बेहद खुबसूरत बनाती है तो वहीं भावनाएं मनुष्य को बेहद ही कमजोर कर देती है। प्रेम में पड़े उन प्रेमी प्रेमिका से पूछिए तो संसार उनके लिए स्वर्ग है और वही जिसकी प्रेमिका का देहांत हो गया है उसके लिए यही संसार नरक के समान हो जाता है। प्रेम, मोह, करूणा, दया, ममता, क्रोध, नफरत, जलन, द्वेष इत्यादि सब भावनाएं हैं जो हमें अपना गुलाम या दास बनाकर रखी हुई है। एक मां जब अपने बच्चे को गुस्से में मारती है या डांटती है तो दरअसल मां यह बता रही होती है कि मेरे बच्चे, मेरे प्राण तुझमें बसते हैं.. तू सही से रहा कर तो ही मैं सुखी और प्रसन्न रहूंगी। एक मां को तब अधिक प्रसन्नता मिलती है जब उसका बच्चा अधिक सुख में रहता है, इसीलिए वह भूखा रहकर भी बच्चे के लिए खाने की व्यवस्था करती है। यह है प्रेम और ममता का सम्मिश्रण भावना जो एक बच्चे को अपने मां से जोड़कर रखती है।
उन कठोर निर्णयों को लेते समय, जिनसे भविष्य को उच्चतम अवस्था में पहुंचाया जाता है और आंतरिक प्रसन्नता हासिल की जाती हैं; यही भावनाएं उन निर्णयों को लेने में बांधा बनती हैं। और वे निर्णय हो ही नहीं पाते हैं और जीवन ऐसे ही थमा रह जाता है। अन्नु कुमारी ने 2015-16 में सिविल सेवा परीक्षा में दूसरी रैंक प्राप्त की और आइएएस अधिकारी बनीं। उन्होंने अपने एक साल के बेटे को खुद से अलग कर दिया था ताकि पढ़ाई में कोई बांधा उत्पन्न ना हो। यह एक बेहद भावनात्मक और कठोर निर्णय था। लेकिन सीने में आग हो और कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो कठोर निर्णय भी होते हैं और उनपर हम कायम भी रहते हैं। यह आसान नहीं होता हैं, सफर में एकबार नहीं सैकड़ों बार तूफान आते हैं और हर बार यह परीक्षा होती है कि हमारे पैरों में कितनी ताकत है जो जमीन से जुड़ी रहती है और प्रत्येक परिस्थिति में एक समान रहती है। जीवन एक सम्भावना है और यहां कुछ भी हो सकता है। जैसे बीज - बीज में छिपे हैं, हजारों पुष्प अप्रकट है, अप्रच्छन्न है। उन रास्तों से जैसे कोई लगाव सा हो जाता है, जहां से हम प्रतिदिन बगैर उन रास्तों पर ध्यान दिए; चलते चले जाते हैं। कुछ कांटे, हमारे पैरों में चुभ जाते हैं तो ऐसा होता है कि हम रास्ते को कोशने लगते हैं लेकिन स्वयं को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराते हैं कि हमने ही बिना देखे कांटो पर पैर रखा था। उस रास्ते से, हमें खट्टे और मीठे अनुभव प्राप्त होते हैं। जब उन रास्तों पर हम होते हैं तो हमें उन रास्तों पर होने का आभास नहीं होता हैं उनके प्रेम और लगाव का अनुभव नहीं होता है और उनसे अलग होने पर हम फिर एक बार फिर उन्हीं राहों पर जाना चाहते हैं। कुछ पल के लिए हमारा मन परिवर्तन को स्वीकार ही नहीं करता है। उन राहों से जब भी आप अलग होंगे तो दुख तो पैदा होगा ही। हम परिवर्तन को नहीं रोक सकते हैं और यदि जीवन में अधिक उन्नति करनी है तो सकारात्मक सोच और बदलाव बहुत जरूरी है।
भाग - 1
✍️ अरविंद कुमार
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