प्रेम की प्रागाढता।

चेतन मन के हिस्सों से आगे बढ़कर व्यक्ति का मूल्यांकन अवचेतन और अचेतन मन के स्तर पर होना चाहिए। वहीं एक सीढ़ी जो हमें ऊपर ले जाती है, वहीं नीचे भी लेकर आती है। दोष सीढ़ीयों का नहीं है; यह तो चढ़ने और उतरने वाले के इच्छा पर निर्भर करता है‌। प्रेम का अर्थ - स्वतंत्र कर देना है और स्वतंत्रता प्राप्त कर लेना है‌। प्रेम में आरोपण या आधिपत्य नहीं होना चाहिए; प्रेम की अनुभूति पाकर, ऐसा महसूस होना चाहिए जैसे व्यक्तित्व को एक नया आकर्षक और मजबूत पंख मिल गया है। किससे प्रेम करते हो, यह सवाल नहीं है - जिससे भी प्रेम करो और यदि उस पर नियंत्रण करना चाहो तो आप उन्हीं सीढीयों का प्रयोग करके नरक की तरफ उतर रहे हो। जिससे भी प्रेम करो, उसे मुक्त करो, आजाद छोड़ दो क्योंकि आप वही काटोगे जो बोवोगे। संसार तो एक प्रतिध्वनि है, जैसा ध्वनि निकालोगे, वहीं लौटकर तुम तक आएगा। 

आधिपत्य प्रेम की हत्या कर देता है, इससे ईर्ष्या का जन्म होता है। प्रेम स्वतंत्रता की तालाब में खिलता है। जब आप एक स्त्री की सौन्दर्य की प्रशंसा करते हो तो आप उसके द्वारा समस्त जगत की स्त्रियों की प्रशंसा करते हो। जब एक पुरुष से प्रेम करते हो तो यह समस्त पुरुषों को प्रेम की अनुभूति करा देना है। प्रेम साधना है, इसमें पड़कर उन्नति होनी चाहिए - यह प्रतिपल आकाश में ऊपर ले जाने वाला होना चाहिए। ऐसा महसूस हो जैसे खुले आकाश के नीचे हम जोर से आह्लादित और प्रसन्न हो सकें, ना कि दम घुटने का अहसास हो। प्रेम और भी बड़ा तप है, क्योंकि इसमें एक दूसरे को ऊपर ले जाना होता है। प्रेम सबसे बड़ा ज्ञान है, जो अंदर की तरफ झांकने का मौका देता है। जीवन की सम्पदा मुफ्त नहीं मिलती है - कठिन है इसे पाना। प्रेम में पड़कर ऐसा महसूस हो जैसे किसी मंदिर में आ गए हो - मन में श्रद्धा और पवित्रता लेकर। यह कारागार में पड़ने जैसा नहीं होना चाहिए। 

प्रेम एक मंदिर है। जिससे भी प्रेम आप करते हो - उसे स्वतंत्र छोड़ देना। जिससे प्रेम करो, उससे अपेक्षा मत करना। ईर्ष्या खड़ा मत होने देना। हमारी चाह का सवाल क्या है, वह व्यक्ति अपने में व्यक्ति हैं। 

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