स्वयं में समाधान की तलाश - 2

कौतूहल, समस्याएं और परेशानियां बाहर नहीं भीतर है। सुख और दुख की विभिन्न धाराएं अंदर से निकलकर बहिर्जगत में अपना प्रभाव डालती हुई दिखती हैं किंतु उनका उत्पन्न होना, समाप्त होना और उन पर नियंत्रण स्थापित करना; अंदर से सम्भव है।

मनुष्य के मस्तिष्क में उत्पन्न एक भावनात्मक विचार, उसके सम्पूर्ण शरीर पर नियंत्रण स्थापित कर उन्हीं के अनुरूप प्रतिक्रियाओं को पैदा करती है। और प्रत्येक विचार संसार के प्रत्येक वस्तुनिष्ठ और आत्मनिष्ठ विषयों के प्रति विभेदीकृत दृष्टिकोण प्रदान कर देती है। उदाहरण के लिए, नये नये प्रेम में पड़कर नायक और नायिका के जीवन में अद्भुत परिवर्तन आता है। वे समस्त संसार को दया और करुणा के भाव से परखने लगते हैं। अक्सर प्रेमी के वेशभूषा, बोली और व्यवहार में परिवर्तन दिखता है, उन स्थानों पर जहां उसकी प्रेमिका के दिख जाने की संभावना अधिक है; वहां वह एक अलग ही मनुष्य बनकर प्रकट हो जाता है। मानव इतिहास का सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर कैसे मानसिक शांति पाई जाए? कैसे कैवल्य और मोक्ष की प्राप्ति हो? महात्मा बुद्ध ने मध्यम मार्ग को इसका हल बताया, महावीर स्वामी तथा उनके पूर्ववर्ती तीर्थंकरों ने शरीर को कष्टों में डालकर मोक्ष पाने का हल बताया तो दूसरी तरफ कर्मवाद, योगाचार विज्ञानवाद, नव्य वेदांत दर्शन, अद्वैतवाद और पाश्चात्य जगत के विचारकों में हाइडेगर, अरस्तू, सुकरात, मैकियावेली, इलियट आदि ने अपने अपने तरीके से इसपर प्रकाश डाला। समस्या यह है कि किसी भी विषय से अनासक्ति का भाव तब तक पैदा नहीं होगा जबतक उस विषय के तीव्र अनुभव से हमारा गुजरना नहीं होगा।

सिद्ध परम्परा - इसी सवाल पर से पर्दा उठाने का प्रयास करता है कि यदि जीवन में किसी भी विषय का अत्यधिक उपभोग कर लिया जाय अर्थात उसे सिद्धि की अवस्था तक ले जाया जाय तो मन में उसके प्रति वैराग्य पैदा हो जाएगा। जैसे बचपन के दिन हमें कितना ही ज्यादा आकर्षित करते हों, लेकिन अब हम बचपन के दिनों में दुबारा नहीं पदार्पण करना चाहते हैं। क्योंकि वह अनुभव हमें एक बार प्राप्त हो चुका है और यह शांति मस्तिष्क को मिल गई है कि बचपन कैसा होता है? सुख, शांति और प्रसन्नता किसी भी विषय या वस्तु में नहीं है - यह मन की चेतन अवस्था है जो निरंतर परिवर्तनशील है। प्रत्येक भागदौड़ का अंतिम लक्ष्य यह होता है कि स्वयं को उस एक विशेष अनुभूति से किस प्रकार संश्लेषित करना संभव है। उदाहरण स्वरुप - किसी भी निर्धन व्यक्ति की धनी बनने की प्रबल महत्वाकांक्षा होती है किंतु धनी बनने के बाद क्या पीड़ाएं, संताप और संत्रास मिलती है - इस अनुभव से यदि वह एक बार गुजरे तो शायद ही वह अमीर बनने की इच्छाएं आत्मसात करें। वारेन बफेट कहते हैं कि,' यह कहने के लिए कि पैसा ही सबकुछ नहीं है इससे पहले आपको अमीर बनना होगा' क्योंकि तभी यह जान पाना संभव है कि धन से गहरी नींद नहीं खरीदी जा सकती है।‌

आत्मा या परमात्मा की खोज, स्वर्ग और नरक की कल्पनाएं, शांति और युद्ध की महिमा मंडित व्याख्याएं, दर्शन और विज्ञान की नये नये अन्वेषण व्यक्ति की महत्वाकांक्षा में ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज हर प्रकार से वृद्धि कर रहे हैं। व्यक्ति महत्वपूर्ण होता जा रहा है, व्यक्तिगत निजता और स्वतंत्रता की मांग में अभिवृद्धि हो रही है। व्यक्ति का महत्व बढ़ रहा है और स्वतंत्रता स्वच्छंदता में परिवर्तित हो रही है। विज्ञान की खोजों ने उनका महत्व घटाया है जो समाज में निचले पायदान पर है और कुछ लोगों का समूह यह निष्कर्ष निकालने के लालायित हैं कि किस प्रकार उत्पादन के समस्त साधनों पर हमारा एकात्मक और केंद्रीकृत अधिकार स्थापित हो जाएं। हमारा जीवन भटकावों में व्यतीत हो रहा है, हमारे पास जो कुछ भी है - वह मिट्टी का ढेर प्रतीत होता है और जो कुछ नहीं है - वह सोना प्रतीत होता है। व्यक्ति का मन उसकी चेतना में यह स्थाई खड्ड बना देता है जो उन विषयों या व्यक्तियों को प्राप्त करने की इच्छा का सूचक है, जो हमारे पास नहीं है क्योंकि उस एक अनुभव से अभी तक संलयन हुआ नहीं है। सिग्मंड फ्रायड की सीमा यह है कि मन की 6 अवस्थाएं ( चेतन, अवचेतन, अचेतन, इड, इगो और सुपर इगो) करने के बाद भी, मनुष्य के मन का पूर्णतः अध्ययन करने के बाद भी वह इन्हीं मन से शासित होता है, इनसे तटस्थ नहीं हो मिलता है। डैनियल गोलमैन ने अपनी पुस्तक 'इमोशनल इंटेलिजेंस' में यह रहस्य उद्घाटित किया कि मनुष्य भावनाओं का दास है और इन भावनाओं का प्रबंधन करना अधिक आवश्यक है। परंतु विडम्बना यह है कि डैनियल के जीवन में भी यही भावनाएं उसे आहत करती हैं, वह भी इनके समक्ष नतमस्तक दिखाई पड़ता है।

मनुष्य के जीवन में कुछ पड़ाव आते हैं और वे चले जाते हैं। इन पड़ावों में कोई व्यक्ति बेरोजगार, दुर्वचनों व दुर्व्यसनो में पर्यवसित, अधिक सारगर्भित व सधा दृष्टिकोण वाला, जिम्मेदार या गैर जिम्मेदार, शक्तिशाली या निर्बल आदि नजर आ सकता है। और प्रसन्नता किसी भी पड़ाव पर आती हुई प्रतीत नहीं होती है। समस्या यह भी है कि आखिर कैसे जो कुछ हमारे पास है उसमें रसात्मक स्थल का अन्वेषण किया जाए? कैसे एक स्थायी आनन्द की प्राप्ति की जाएं? जब हम किसी व्यक्ति में सुख व प्रसन्नता तलाशते हैं तो दुख व पीड़ा भी प्राप्ति होती है क्योंकि कोई भी व्यक्ति पूर्ण नहीं है। जीन पाल सार्त्र ने अपनी अस्तित्ववाद में यह लिखा है कि ' समस्या किसी व्यक्ति के साथ होने में नहीं है; समस्या किसी भी व्यक्ति के साथ होने में है।' और वह दुहराता था कि- Existence of other people is hell for me. लेकिन इसके विलोम में यदि प्रसन्नता स्वयं में तलाशा जाय तो ऐसा नहीं है कि यहां दुख नहीं है और समाज से कटकर जीना मनुष्य के लिए सम्भव नहीं । अरस्तू का यह कथन कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। मनुष्य के लिए समाज की आवश्यकताओं को बताता है।

सवाल अब भी वही है कि मानसिक रूप से स्वयं को संतुष्ट कैसे रखा जाय? शांति कैसे प्राप्त की जाय? मनुष्य के जीवन में कुछ क्षण आते हैं जब वह वर्तमान को अतीत और भविष्य से ना जोड़कर केवल कुछ क्षणों में वह आनंद प्राप्त कर लेता है। विचारशून्य मनुष्य नहीं हो पाता, हर पल उसे कोई ना कोई विचार उसके चेतन मन को जकड़े रहती है, यह विचार प्रसन्नता के तथा अवसाद दोनों के हो सकते हैं। नागार्जुन ने माध्यमिक शून्यवाद में शून्य की महत्ता को उद्घाटित किया है और बताया कि- शांति या कैवल्य तब प्राप्त हो सकती है- जब व्यक्ति विचारशून्य की अवस्था में आए। बाहरी जगत परेशानियां पैदा करती हैं तो आंतरिक जगत एक हल प्रदान करता है। दूसरा तरीका यह हो सकता है कि किसी भी विषय, व्यक्ति या वस्तु से जुड़ने से पहले और जुड़ते वक्त उसके समाप्त होने की घटना से उठने वाले दर्द को भी हम अपने मस्तिष्क में चलने दें जिससे जब वह समाप्त होगा तब दुख के वे पल हमें उतना प्रभावित नहीं करेंगे जितना कि वे अकस्मात् कर सकते थें। अर्थात संसार में रहते हुए सांसारिक ना होना। तीसरा एक विभेदीकृत दृष्टिकोण हम अपनाएं। हर घटना में सकारात्मक स्थिति को देख सकें, वह देखें जो हमें प्राप्त है ना कि वे देखें और विचार करें जो हमारी पहुंच से दूर है। महत्वाकांक्षाएं होनी चाहिए लेकिन उनसे प्रसन्नता ही मिले तो ज्यादा तार्किक स्थिति होगी।

हम अपनी सुख, शांति व प्रसन्नता के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं और हमें वह परिस्थितियां पैदा करनी चाहिए जो इसमें गुणात्मक अभिवृद्धि करें।

अरविंद कुमार ।
{ नववर्ष की ढेरों सारी शुभकामनाएं }

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